कोई गांव तक रिक्शा अगर जा रही है तो आपको एक तरफ छोटे छोटे पहाड़ को कृतियां और दूसरी तरफ पानी से भरपूर नदिया देखने को मिलती है, कही गेहूं से लहराते सुनहरे खेत तो कही रास्ते में आता कोई मनोरम्य गांव का नज़ारा । गांव में बनी कोई दुकान पे बच्चो की लगी महफिल और चौराहे पे सफेद कपड़ों में बैठे सफेद दाढ़ी वाले लोग। खेतो से लौटती हुई स्त्रियां और उनके बच्चे साथ ही ढलती हुई सुनहरी शाम।
मिडल क्लास लोगो को कही जाना हो तो ola या uber नही बुक कर सकते। हम लोग अगर २ या ३ km का सफर हो तो पैदल तय करते है, या तो हमारे जैसे ही मिडल क्लास लोगो की ऑटोरिक्शा में। तीन पहियों पे चलने वाली रिक्शा में भले कोई एर कंडीशनर का सिस्टम न हो पर नेचरल हवा का अनुभव हमे जीवंत रखता है।
नए नए बने हुए रोड पे ये रिक्शा वाले को पहले से ज्यादा स्पीड पे चलने का मन कर रहा होगा। बाएं तरफ के आइने से देखता हुआ ये अपनी धुन में रिक्शा चला रहा है, और में अपना झोला अपने एक पैर पे टिका के ड्राइवरसिट पे बैठ के दोनो हाथ से टाइपिंग करते बैलेंस बना रहा हु ।
अभी गांव आने में थोड़ी ही देर है और शाम ढल रही है, रिक्शा में हम दो एक ड्राइवर और में हूं, सारे लोग पीछे उतर चुके है। तभी में अपनी जेब में पैसे निकाल ने का प्रयास कर रहा हु। मे रिक्शा में बैठने से पहले चाय पीने गया था वहा पे चायवाले को १०० रुपए दिए तो उसने मुझे ९० रुपए वापिस दिए। जिसमे ५० की एक नोट और २० की दो नोट थी। वही पैसे मैने रिक्शा वाले को देने का सोचा और फिर रिक्शा वाले को पुछा “भैया भाड़ा कितना हुआ?”। रिक्सा वाले ने बोला २० रुपए। मन को शांत करने वाले इस सफर के लिए उस ड्राइवर ने २० रुपए ही लगाए।