थकान दुनिया की

थक गया हूं यार ये सब सह सह के, मुझे जीवन महसूस नहीं हो रहा, किसी भी गाने का असर नहीं हो रहा, इसलिए गाना सुनना भी बंद कर दिया है। बस बैठा हूं एकेला कोई गांव के बस स्टेंड पे यूंही किसी बस की राह देख के, अगर बस मुझे कही पे भी ले जाएं तो चला जाऊंगा बिना सवाल किए, पर एक तरफ ऐसा खयाल आता है के घर पे सब मेरी चिंता करेगे ये सोच के पहले खयाल को हटा दे रहा हूं, मेरे दाएं तरफ लोग अपने परिवार के साथ पानीपुरी खा रहे है, में भी खा सकता हु, पर मेरे पास पैसे की कमी है, और इस वजह से में उस तरफ न देखने का प्रयास करता रहता हु। यहा बैठे लोग कबसे देख रहे है मेरे सामने पर मुझे अब फरक नही पड रहा। पहले लोग देखते थे तो अजीब महसूस होता था। अहमदाबाद से राजकोट आते आते बाल बिखर गए है । सफर और गर्मी के वजहसे बोहत सारी थकान महसूस हो रही है। शायद इसलिए में इस थकान को दुनिया से थकान समज बैठा हु।

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